Tuesday, October 6, 2009
स्टेटस सिंबल बना करवाचौथ
बुधवार 7 अक्टूबर को हिंदु धर्म की शादीशुदा महिलाओं के लिए बड़ा ईवेंट है...इस दिन महिलाएं अपने सुहाग की दीर्घायु और खुशहाल दाम्पत्य जीवन के लिए एक दिन का व्रत रखेंगी...इस व्रत को करवाचौथ कहा जाता है...महिलाएं रात में शिव-पार्वती का पूजन करने के साथ चौथ माता की कथा सुनेंगी और चांद के निकलने पर पूजन के बाद करवे का जल लेकर भोजन ग्रहण करेंगी...
ये सब तो ठीक है...पर इस व्रत की महिमा पिछले कुछ सालों से लगातार बढ़ती जा रही है...ये एकमात्र ऐसा व्रत है जिसने टीवी की दुनिया में कब्जा कर रखा है...न केवल टीवी बल्कि सिनेमा या यूं कह सकते हैं कि समुचे एंटरटेन्मेंट उद्योग में भी इसका ख़ासा दबदबा है...आखिर क्या कारण है इस त्यौहार की इतनी लोकप्रियता का...
दरअसल इस दिन का इंतज़ार महिलाएं साल भर करती है...ख़ास इसी दिन महिलाओं का अपने शौहरों के लिए प्रेम ज्यादा हो जाता है...देर से घर आने वाले शौहर भी इस दिन समय से घर आ जाते हैं...कुल मिलाकर इस दिन पति - पत्नि का प्रेम देखने लायक होता है...
देश की ज्यादातर महिलाएं करवाचौथ का व्रत देखा देखी में भी करती हैं...और इस दिन के लिए देशभर के बाज़ार महिनों भर पहले से तैयारी कर लेते हैं...खासकर महिलाओं के सजने संवरने वाले मार्केट अपनी पूरी रेंज मैदान में उतार लेते हैं...साड़ी हो मेकअप से संबंधित सामान हो या कुछ और...
इस दिन ब्यूटी पार्लरों की भीड़ देखते ही बनती है,शहर के प्रतिष्ठित और नामी पार्लरों पर तो बुकिंग पहले ही शुरु हो जाती है...सोने-चांदी,हीरे की ज्वेलरी शोरुमों के नज़ारे भी देखने लायक होते हैं...सारे बाज़ार सज चुके होते हैं...
न्यूज़ चैनलों को भी त्यौहार को कैश कराने का मौका मिल गया है...तरह तरह की खबरों के साथ...जैसे क्या पहनें , क्या लगाएं , ज्वेलरी में क्या लें , पति के साथ क्या करें...तमाम लाईव तमाम फार्मेट...चूकि महिलाएं इस दिन अपनी सुंदरता की पराकाष्ठा पर होती हैं...और टीवी के कैमरों को भी सुंदर महिलाएं ज्यादा प्रिय होती है...इसलिए भी टीवी पर ज्यादा से ज्यादा खूबसूरत महिलाओं को दिखाया जाता है...
टीवी हो या फिल्में एक बात सामान्य है...हर जगह संभ्रांत-संपन्न परिवारों की महिलाएं ही व्रत करते हुए देखी जाती हैं...क्योंकि इस त्यौहार ने गरीब तबके की महिलाओं से दूरी जो बना ली है...
नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़...
Thursday, October 1, 2009
आडवाणी जी का अंतिम पड़ाव...
आजकल समाचारों में आडवाणी जी के रिटायरमेंट की ढ़ेरों खबरें आ रही है...हालाकि लोकसभा चुनावों में हार के बाद भी ऐसी चर्चाओं का बाज़ार गर्म था...पर क्या हुआ...
90 के रथ यात्रा से राजनीति के चरम पर पहुंचने वाले आडवाणी जी का वह सुनहरा समय अब अपने अंतिम पड़ाव पर है...राजनीति में उनका साथ देने वाले भी अब उनका साथ छोड़ रहे हैं या छोड़ने का मन बना रहे हैं...
वैसे अब भाजपा का वह गोल्डन पीरियड जा भी चुका है...जिसमें अटल - आडवाणी की जोड़ी काम किया करती थी...आडवाणी जी अक्सर अपनी जोड़ी के बारे में कहा करते हैं कि हमारी जोड़ी राम - लक्ष्मण या जय - वीरु की जोड़ी है...लेकिन जब तक अटल जी का नेतृत्व चलता रहा आडवाणी जी ने उनके दिशा निर्देशों का तन्मयता के साथ पालन किया...हालाकि अपने इन 5 दशकों के करियर में ऐसे कई मौके आए जब उन्होंने अपने हितों को ज्यादा अहमियत दी... चाहे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का प्रचारक होते हुए शादी कर पारंपरिक गृहस्थ जीवन शुरू करने का फैसला हो...
या
पाकिस्तान जाकर जिन्ना को धर्मनिर्पेक्ष करार देने संबंधी बयान , उमा भारती के साथ हुआ विवाद... आडवाणी जी हमेशा विवादों में उलझते रहे...वैसे इसमें कोई दो राय नहीं है कि वे देश के सबसे अनुभवी राजनेताओं में शामिल हैं...
वे आजादी के बाद होने वाले तमाम महत्वपूर्ण घटनाक्रमों के साक्षी हैं...चाहे 75 में इंदिरा गांधी द्वारा इमरजेंसी लगाए जाने का मामला हो या फिर अयोध्या आंदोलन, जिसकी वजह से उनकी पार्टी 99 में केंद्र में सत्ता पर काबिज हो सकी...
आडवाणी को अवसरों का लाभ उठाने वाला माहिर नेता माना जाता रहा है... लेकिन उनकी महत्वाकांक्षाएं किसी न किसी वजह से अधूरी ही रह जाती हैं...1990 की रथ यात्रा से लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने वाले आडवाणी वाजपेयी के आभा मंडल को एनडीए सरकार के कार्यकाल तक नहीं भेद पाए...और अपनी ही टीम के कुछ लोगों के आंख की किरकिरी बने रहे...
वाजपेयी की विदाई के बाद उन्हें लगा कि अब तो प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा होने ही वाला है...और स्वघोषित रुप से उन्होंने अपने आप को पीएम इन वेटिंग जैसा जुमला भी दे डाला ...मगर आडवाणी जी के अड़ियल रवैये या कुछ छोटी गलतियां उनको ले डूबती रही हैं...
कुल मिलाकर आडवाणी जी का संन्यास लेने का ये सही समय है...या उनकी राजनीति का यह अंतिम पड़ाव है...
कुछ भी हो मगर उनके रिटायरमेंट से निश्चित रुप से भाजपा और कमजोर होगी...
नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़...
90 के रथ यात्रा से राजनीति के चरम पर पहुंचने वाले आडवाणी जी का वह सुनहरा समय अब अपने अंतिम पड़ाव पर है...राजनीति में उनका साथ देने वाले भी अब उनका साथ छोड़ रहे हैं या छोड़ने का मन बना रहे हैं...
वैसे अब भाजपा का वह गोल्डन पीरियड जा भी चुका है...जिसमें अटल - आडवाणी की जोड़ी काम किया करती थी...आडवाणी जी अक्सर अपनी जोड़ी के बारे में कहा करते हैं कि हमारी जोड़ी राम - लक्ष्मण या जय - वीरु की जोड़ी है...लेकिन जब तक अटल जी का नेतृत्व चलता रहा आडवाणी जी ने उनके दिशा निर्देशों का तन्मयता के साथ पालन किया...हालाकि अपने इन 5 दशकों के करियर में ऐसे कई मौके आए जब उन्होंने अपने हितों को ज्यादा अहमियत दी... चाहे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का प्रचारक होते हुए शादी कर पारंपरिक गृहस्थ जीवन शुरू करने का फैसला हो...
या
पाकिस्तान जाकर जिन्ना को धर्मनिर्पेक्ष करार देने संबंधी बयान , उमा भारती के साथ हुआ विवाद... आडवाणी जी हमेशा विवादों में उलझते रहे...वैसे इसमें कोई दो राय नहीं है कि वे देश के सबसे अनुभवी राजनेताओं में शामिल हैं...
वे आजादी के बाद होने वाले तमाम महत्वपूर्ण घटनाक्रमों के साक्षी हैं...चाहे 75 में इंदिरा गांधी द्वारा इमरजेंसी लगाए जाने का मामला हो या फिर अयोध्या आंदोलन, जिसकी वजह से उनकी पार्टी 99 में केंद्र में सत्ता पर काबिज हो सकी...
आडवाणी को अवसरों का लाभ उठाने वाला माहिर नेता माना जाता रहा है... लेकिन उनकी महत्वाकांक्षाएं किसी न किसी वजह से अधूरी ही रह जाती हैं...1990 की रथ यात्रा से लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने वाले आडवाणी वाजपेयी के आभा मंडल को एनडीए सरकार के कार्यकाल तक नहीं भेद पाए...और अपनी ही टीम के कुछ लोगों के आंख की किरकिरी बने रहे...
वाजपेयी की विदाई के बाद उन्हें लगा कि अब तो प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा होने ही वाला है...और स्वघोषित रुप से उन्होंने अपने आप को पीएम इन वेटिंग जैसा जुमला भी दे डाला ...मगर आडवाणी जी के अड़ियल रवैये या कुछ छोटी गलतियां उनको ले डूबती रही हैं...
कुल मिलाकर आडवाणी जी का संन्यास लेने का ये सही समय है...या उनकी राजनीति का यह अंतिम पड़ाव है...
कुछ भी हो मगर उनके रिटायरमेंट से निश्चित रुप से भाजपा और कमजोर होगी...
नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़...
वोट फॉर कंडोम , प्लीज़...
देश में आजकल क्या - क्या हो रहा है देख सुनकर आश्चर्य चकित हूं...
मसलन
हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं...आजकल वहां से खबरों का प्रवाह भी ज्यादा है...इसी बीच एक ऐसी खबर आई जो लोकतंत्र का मज़ाक उड़ाती लग रही थी...
हरियाणा की किसी सीट से एक निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव में खड़े हुए हैं...जिनका नाम हैं आनंद शर्मा...जो कि मूल रुप से एक लेखक हैं...इन्होंने ऐसा बम फोड़ा है जिसे सुनकर लगता है कि लोकतंत्र की पवित्रता का यह अंतिम पड़ाव है...हालाकि यह बहुत बड़ी बात हो गई...मगर फिर भी मुझे तो कुछ कुछ ऐसा ही लगता है...
मामला ये है कि शर्मा जी ने चुनाव आयोग से चुनाव चिन्ह कंडोम मांगा है...चुनाव आय़ोग ने बड़े मुश्किल से इन्हें सम्मानपूर्वक मनाया है...कंडोम चुनाव चिन्ह मांगने पर बड़ा बवाल भी हुआ...क्षेत्र के विपक्षी कह रहे हैं कि शर्मा जी अश्लिलता फैलाना चाह रहे हैं...इन सब के बाद भी शर्मा जी इस चिन्ह को हासिल करने के लिए बड़ा ज़ोर लगाए हुऐ हैं...लगातार चुनाव आयोग के संपर्क में भी हैं...अगर ऐसा होता है तो भारतीय इतिहास में पहली बार होगा...
विपक्षियों की बात में दम तो है...आज शर्मा जी ने कंडोम मांगा है , कल कोई वर्मा जी या कोई महिला उम्मीदवार ब्रा - पैंटी का चुनाव चिन्ह मांगने लगे...हालाकि इसमें कोई बुराई भी नहीं है क्योंकि देश में गरीबी का आलम ये है कि लोगों के पास खाने के पैसे तो हैं नहीं , ये अंतः वस्त्र कहां से पहनेंगे...इसमें भी तो जागरुकता वाली बात है...
अगर शर्मा जी को कंडोम चुनाव चिन्ह मिल जाता है तो वो भले हार जाएं...मगर देश भर में चर्चित ज़रुर हो जाएंगे...और अपनी लोकप्रियता का फायदा इस बार तो नहीं , लेकिन 2014 के चुनावों में ज़रुर उठा लेंगे...
मगर कुछ भी हो शर्मा जी का कंडोम के प्रति लगाव देखते ही बनता है...
नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़...
मसलन
हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं...आजकल वहां से खबरों का प्रवाह भी ज्यादा है...इसी बीच एक ऐसी खबर आई जो लोकतंत्र का मज़ाक उड़ाती लग रही थी...
हरियाणा की किसी सीट से एक निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव में खड़े हुए हैं...जिनका नाम हैं आनंद शर्मा...जो कि मूल रुप से एक लेखक हैं...इन्होंने ऐसा बम फोड़ा है जिसे सुनकर लगता है कि लोकतंत्र की पवित्रता का यह अंतिम पड़ाव है...हालाकि यह बहुत बड़ी बात हो गई...मगर फिर भी मुझे तो कुछ कुछ ऐसा ही लगता है...
मामला ये है कि शर्मा जी ने चुनाव आयोग से चुनाव चिन्ह कंडोम मांगा है...चुनाव आय़ोग ने बड़े मुश्किल से इन्हें सम्मानपूर्वक मनाया है...कंडोम चुनाव चिन्ह मांगने पर बड़ा बवाल भी हुआ...क्षेत्र के विपक्षी कह रहे हैं कि शर्मा जी अश्लिलता फैलाना चाह रहे हैं...इन सब के बाद भी शर्मा जी इस चिन्ह को हासिल करने के लिए बड़ा ज़ोर लगाए हुऐ हैं...लगातार चुनाव आयोग के संपर्क में भी हैं...अगर ऐसा होता है तो भारतीय इतिहास में पहली बार होगा...
विपक्षियों की बात में दम तो है...आज शर्मा जी ने कंडोम मांगा है , कल कोई वर्मा जी या कोई महिला उम्मीदवार ब्रा - पैंटी का चुनाव चिन्ह मांगने लगे...हालाकि इसमें कोई बुराई भी नहीं है क्योंकि देश में गरीबी का आलम ये है कि लोगों के पास खाने के पैसे तो हैं नहीं , ये अंतः वस्त्र कहां से पहनेंगे...इसमें भी तो जागरुकता वाली बात है...
अगर शर्मा जी को कंडोम चुनाव चिन्ह मिल जाता है तो वो भले हार जाएं...मगर देश भर में चर्चित ज़रुर हो जाएंगे...और अपनी लोकप्रियता का फायदा इस बार तो नहीं , लेकिन 2014 के चुनावों में ज़रुर उठा लेंगे...
मगर कुछ भी हो शर्मा जी का कंडोम के प्रति लगाव देखते ही बनता है...
नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़...
Tuesday, September 22, 2009
मंदी की मां का...
मंदी की मां का - मंदी की बहन का...
ऐसी गालियों की तुकबंदी आजकल आप हर प्राइवेट कंपनीज़ में काम करने वाले कर्मचारियों के मुंह से सुन सकते हैं...चाहे आप चाय पी रहे हो या सिगरेट,बाजार में खड़े हो या घर में...कहीं भी...
इतनी गालियां तो कभी नेताओं ने भी नहीं खायीं होंगी जितनी ये बेचारी मंदी खा रही है...सबको परेशान कर के रखा है...
आखिर इसको गरियाने का कारण क्या है...
दरअसल दुनिया में आई इस वैश्विक मंदी ने कुछ देशों को परेशान तो किया ही है मगर भारत जैसे देश को इतना परेशान नहीं किया है...खासकर मीडिया सेक्टर तो इतना प्रभावित नहीं है...जितना कंपनियों के मालिक रो रहे हैं...
8 घंटे की शिफ्ट में कुछ नहीं तो 800 बार मंदी का ज़िक्र सुनने को मिलता है...कभी किसी से तो कभी किसी से...
हालाकि अब बोर भी हो गए हैं और इरिटेट भी...और अब सब कुछ भगवान पर छोड़ दिया है...
सीनियर और मंदी के जानकार या मंदी विशेषज्ञ अक्सर ये राय देते हैं कि बेटा कुछ दिन का और कष्ट है रुक जाओ...अभी नौकरी छोड़ने की बात मत करो...कहीं कुछ नहीं हो पा रहा है,मैं तो खुद लगा हुआ हूं...
कभी कभी ऐसा भी लगता है कि संस्थान के मालिक मजे ले रहे हैं...जानते हैं साले कहीं भागेंगे नहीं और भागेंगे भी तो सब एकसाथ नहीं...इसलिए अभी न तो इनकी सैलरी में कोई इन्क्रिमेंट लगाओ और न ही कोई प्रोमोशन दो...
एक और बात शायद मैंने इतने विज्ञापन सामान्य समय में नहीं देखे होंगे जितने मंदी के दौर में देखने को मिल रहे हैं...
सुना है चैनल भी पिछले कुछ महीनों से लगातार नंबर 1 पर बना हुआ है...अच्छा है मियां घायल शेरों की मेहनत है...
रंग तो लाएगी ही...ले लो मजे...
मंदी की वजह से साला शिफ्ट का टाईम भी बढ़ा दिया है...हालाकि बढ़ाने वाले साहब लोगों की भी मजबूरी है...मालिक का हितैषी जो बनना है...साहब लोगों को भी किसी चीज़ में ना करना नहीं आता...मीटिंग में उच्च अधिकारी कुछ बोलते हैं कि ये काम हो सकता है क्या??? साहब लोग तुरंत जी सर हो जाएगा - आप निश्चिंत हो जाइए...तुरंत एक आदेश आता है बेटा ये सरकारी काम है इसे तुरंत समझ लो...मरती हम लोगों की है...बढ़िया है किसी को तो फायदा होता है...
महंगाई लगातार बढ़ रही है सैलेरी उतनी ही है...साला महंगाई और वेतन के बढ़ने घटने का कोई अनुपात ही नहीं बन पा रहा है...हमसे अच्छे तो सरकारी कर्मचारी है जिनके पास मंदी की हवा फटकती तक नहीं है...सरकारी कर्मचारी राजा जैसे काम करो के सिद्धांत पर चलते हैं...काम करना हो तो करो न करना हो तो मत करो...कोई सस्पेंड भी करेगा तो आधी तन्ख्वाह तो मिलेगी ही...
बहरहाल इन सब के बीच हमारे जैसे लोगों के ताज़िये ठंडे हो गए हैं...बुरे फंसे हैं जवानी के इस गोल्डन पीरियड में...अंत में इतना लिखते लिखते तो एक बार फिर मेरा मन कर रहा है मंदि को गरियाने का...मंदी की मां का...
नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़
ऐसी गालियों की तुकबंदी आजकल आप हर प्राइवेट कंपनीज़ में काम करने वाले कर्मचारियों के मुंह से सुन सकते हैं...चाहे आप चाय पी रहे हो या सिगरेट,बाजार में खड़े हो या घर में...कहीं भी...
इतनी गालियां तो कभी नेताओं ने भी नहीं खायीं होंगी जितनी ये बेचारी मंदी खा रही है...सबको परेशान कर के रखा है...
आखिर इसको गरियाने का कारण क्या है...
दरअसल दुनिया में आई इस वैश्विक मंदी ने कुछ देशों को परेशान तो किया ही है मगर भारत जैसे देश को इतना परेशान नहीं किया है...खासकर मीडिया सेक्टर तो इतना प्रभावित नहीं है...जितना कंपनियों के मालिक रो रहे हैं...
8 घंटे की शिफ्ट में कुछ नहीं तो 800 बार मंदी का ज़िक्र सुनने को मिलता है...कभी किसी से तो कभी किसी से...
हालाकि अब बोर भी हो गए हैं और इरिटेट भी...और अब सब कुछ भगवान पर छोड़ दिया है...
सीनियर और मंदी के जानकार या मंदी विशेषज्ञ अक्सर ये राय देते हैं कि बेटा कुछ दिन का और कष्ट है रुक जाओ...अभी नौकरी छोड़ने की बात मत करो...कहीं कुछ नहीं हो पा रहा है,मैं तो खुद लगा हुआ हूं...
कभी कभी ऐसा भी लगता है कि संस्थान के मालिक मजे ले रहे हैं...जानते हैं साले कहीं भागेंगे नहीं और भागेंगे भी तो सब एकसाथ नहीं...इसलिए अभी न तो इनकी सैलरी में कोई इन्क्रिमेंट लगाओ और न ही कोई प्रोमोशन दो...
एक और बात शायद मैंने इतने विज्ञापन सामान्य समय में नहीं देखे होंगे जितने मंदी के दौर में देखने को मिल रहे हैं...
सुना है चैनल भी पिछले कुछ महीनों से लगातार नंबर 1 पर बना हुआ है...अच्छा है मियां घायल शेरों की मेहनत है...
रंग तो लाएगी ही...ले लो मजे...
मंदी की वजह से साला शिफ्ट का टाईम भी बढ़ा दिया है...हालाकि बढ़ाने वाले साहब लोगों की भी मजबूरी है...मालिक का हितैषी जो बनना है...साहब लोगों को भी किसी चीज़ में ना करना नहीं आता...मीटिंग में उच्च अधिकारी कुछ बोलते हैं कि ये काम हो सकता है क्या??? साहब लोग तुरंत जी सर हो जाएगा - आप निश्चिंत हो जाइए...तुरंत एक आदेश आता है बेटा ये सरकारी काम है इसे तुरंत समझ लो...मरती हम लोगों की है...बढ़िया है किसी को तो फायदा होता है...
महंगाई लगातार बढ़ रही है सैलेरी उतनी ही है...साला महंगाई और वेतन के बढ़ने घटने का कोई अनुपात ही नहीं बन पा रहा है...हमसे अच्छे तो सरकारी कर्मचारी है जिनके पास मंदी की हवा फटकती तक नहीं है...सरकारी कर्मचारी राजा जैसे काम करो के सिद्धांत पर चलते हैं...काम करना हो तो करो न करना हो तो मत करो...कोई सस्पेंड भी करेगा तो आधी तन्ख्वाह तो मिलेगी ही...
बहरहाल इन सब के बीच हमारे जैसे लोगों के ताज़िये ठंडे हो गए हैं...बुरे फंसे हैं जवानी के इस गोल्डन पीरियड में...अंत में इतना लिखते लिखते तो एक बार फिर मेरा मन कर रहा है मंदि को गरियाने का...मंदी की मां का...
नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़
Wednesday, September 16, 2009
मोदी के 59 बरस...
17 सितंबर 1950 को गुजरात के मेहसाणा के एक मध्यम वर्गीय परिवार में नरेंद्र मोदी नाम का एक कमल का फूल खिला...जो आज वाइब्रेंट गुजरात का मुखिया है...मोदी आज 59 साल के हो गए हैं...अपने आक्रामक तेवर व अपनी विकासशील सोच के लिए पहचाने जाने वाले मोदी ने अपने जीवन में काफी उतार चढ़ाव देखे हैं...इमरजेंसी से लेकर गोधरा दंगों तक...विरोधी उन्हें मौत का सौदागर कहते रहे और उनपर चौतरफा हमले करते रहे पर वे अपना काम पूरी द़ढ़ता के साथ करते रहे...यही उनकी ताकत है...
नरेंद्र मोदी गुजरात के सबसे लोकप्रिय और सबसे ज़्यादा लंबे समय तक राज करने वाले मुख्यमंत्री हो गए हैं...गुजरात में भाजपा के वर्चस्व का एकमात्र कारण मोदी ही हैं...2002 में गुजरात में हुआ दंगों के बाद उन पर कट्टर हिंदू सांप्रदायिक नेता होने का कलंक लगा जिसे वह विकास के तमाम दावों के बावजूद साफ नहीं कर पाए...ये उनकी किस्मत ही है या विरोधियों की राजनीति...
नरेंद्र मोदी ने राजनीति मे अपना करियर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य के तौर पर शुरू किया...1987 में वह बीजेपी में शामिल हुए और एक ही साल में गुजरात शाखा के महासचिव बन गए...1995 में जब बीजेपी दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में आई तो मोदी को पार्टी के राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी दी गई...केशुभाई पटेल के नेतृत्व वाली यह सरकार कुछ ही समय चली और शंकरसिंह वाघेला के बीजेपी से अलग हो जाने से सरकार गिर गई...
1998 के विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी फिर सत्ता में आई...मगर केशुभाई का राज जनता को रास नहीं आया और उसका नतीज़ा 2001 के उपचुनावों में पार्टी की हार के रूप में सामने आया...तब सरकार और पार्टी को उबारने के लिए मोदी को मुख्यमंत्री बनाया गया...जो कि गुजरात के विकास के लिए सही निर्णय था...
2002 फरवरी में गोधरा स्टेशन पर हिंदू तीर्थयात्रियों से लदी एक ट्रेन में आग लगने(बनर्जी कमिशन की रिपोर्ट के मुताबिक) या लगाने (नानावटी कमिशन की रिपोर्ट के मुताबिक) की घटना के बाद भीषण मुस्लिम विरोधी दंगे भड़के...जिससे मोदी सरकार को खुला समर्थन मिला... मोदी हिंदुओं के नायक के तौर पर उभरे और उनको जनसमर्थन का फल 2002 और 2007के चुनावों में मिला...साथ ही हाल ही में हुए उपचुनावों में भी मोदी को उन मुस्लिम इलाकों में भी जनसमर्थन मिला जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी...
मोदी को उनके प्रशंसक और शुभचिंतक उन्हें राष्ट्रीय राजनीति करते देखना चाहते हैं...भारत को उनके जैसे द़ढ़निश्चयी नेता की सख्त ज़रूरत है...
अन्त में मोदी को नमन और जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं...
नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़...
नरेंद्र मोदी गुजरात के सबसे लोकप्रिय और सबसे ज़्यादा लंबे समय तक राज करने वाले मुख्यमंत्री हो गए हैं...गुजरात में भाजपा के वर्चस्व का एकमात्र कारण मोदी ही हैं...2002 में गुजरात में हुआ दंगों के बाद उन पर कट्टर हिंदू सांप्रदायिक नेता होने का कलंक लगा जिसे वह विकास के तमाम दावों के बावजूद साफ नहीं कर पाए...ये उनकी किस्मत ही है या विरोधियों की राजनीति...
नरेंद्र मोदी ने राजनीति मे अपना करियर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य के तौर पर शुरू किया...1987 में वह बीजेपी में शामिल हुए और एक ही साल में गुजरात शाखा के महासचिव बन गए...1995 में जब बीजेपी दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में आई तो मोदी को पार्टी के राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी दी गई...केशुभाई पटेल के नेतृत्व वाली यह सरकार कुछ ही समय चली और शंकरसिंह वाघेला के बीजेपी से अलग हो जाने से सरकार गिर गई...
1998 के विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी फिर सत्ता में आई...मगर केशुभाई का राज जनता को रास नहीं आया और उसका नतीज़ा 2001 के उपचुनावों में पार्टी की हार के रूप में सामने आया...तब सरकार और पार्टी को उबारने के लिए मोदी को मुख्यमंत्री बनाया गया...जो कि गुजरात के विकास के लिए सही निर्णय था...
2002 फरवरी में गोधरा स्टेशन पर हिंदू तीर्थयात्रियों से लदी एक ट्रेन में आग लगने(बनर्जी कमिशन की रिपोर्ट के मुताबिक) या लगाने (नानावटी कमिशन की रिपोर्ट के मुताबिक) की घटना के बाद भीषण मुस्लिम विरोधी दंगे भड़के...जिससे मोदी सरकार को खुला समर्थन मिला... मोदी हिंदुओं के नायक के तौर पर उभरे और उनको जनसमर्थन का फल 2002 और 2007के चुनावों में मिला...साथ ही हाल ही में हुए उपचुनावों में भी मोदी को उन मुस्लिम इलाकों में भी जनसमर्थन मिला जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी...
मोदी को उनके प्रशंसक और शुभचिंतक उन्हें राष्ट्रीय राजनीति करते देखना चाहते हैं...भारत को उनके जैसे द़ढ़निश्चयी नेता की सख्त ज़रूरत है...
अन्त में मोदी को नमन और जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं...
नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़...
Thursday, July 16, 2009
इस अंजुमन में आपको आना है एक बार...
मैनें अपनी इस पहली नौकरी के पूरे 1 वर्ष के इस कार्यकाल में कुछ अनुभव किए हैं...जो शायद आप सभी लोगों ने भी अपनी पहली नौकरी में ज़रूर किये होंगे...
आप लोग मेरी इस बात पर कतई दो राय नहीं रखते होंगे कि हमारी पहली नौकरी में हमारी उस नई वैश्या के समान स्थिती होती है जो बाज़ार में पहली बार अपना शरीर बेचने के लिए जाती है...(उनका बाज़ार हमारा चैनल)...
क्योंकि जब हम फ्रेशर के तौर पर आते हैं तब हमारे सभी सीनियर इस क्षेत्र में परिपक्व हो चुके होते हैं...और जो उनके साथ पूर्व में हुआ हो वही हमारे साथ भी करने की भरसक कोशिश करते हैं...और हमारा किसी भी बात पर या किसी भी विषय पर बलात्कार करने से पीछे नहीं हटते...
जैसे पहली बार जब हमारे सीनियर हमारी लेने की कोशिश करते हैं तब हमें अपनी बेइज्जती महसूस होती है वहीं वैश्या को भी अपनी पहली रात में कुछ ऐसा ही अनुभव होता है...
पर कुछ समय निकालने के बाद या मन से काम करते रहने के बाद थोड़ी सीनियारिटी आ ही जाती है...
वैसे ही उस नई वैश्या की भी यही हालत होती है जैसे जैसे वह बाज़ार में हाथों हाथ बिकने लगती है वैसे वैसे उसमें परिपक्वता आती जाती है...बिल्कुल वैसी ही स्थिती हमारी भी होती है...
या यूं कहें कि जैसे जैसे हमारे कपड़े न्यूज़रुम में सरेआम उतारे जाते हैं वैसे वैसे हमारा कॉन्फिडेंस लेवल और भी बढ़ता जाता है...
वैसे एक बात मैं आपको बताता चलूं कि अभी हमें निर्वस्त्र नहीं किया गया है क्योंकि सीनियरों के अनुसार हमें निर्वस्त्र होने में 10-12 साल और लगेंगे...मतलब हमारा पूरा मज़ा लिया जाएगा बिना पैसे के...
ईश्वर से कामना करता हूं की जल्द से जल्द हम भी प्रोफेशनल प्रॉस्टिट्यूट बन जाए...
नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़...
आप लोग मेरी इस बात पर कतई दो राय नहीं रखते होंगे कि हमारी पहली नौकरी में हमारी उस नई वैश्या के समान स्थिती होती है जो बाज़ार में पहली बार अपना शरीर बेचने के लिए जाती है...(उनका बाज़ार हमारा चैनल)...
क्योंकि जब हम फ्रेशर के तौर पर आते हैं तब हमारे सभी सीनियर इस क्षेत्र में परिपक्व हो चुके होते हैं...और जो उनके साथ पूर्व में हुआ हो वही हमारे साथ भी करने की भरसक कोशिश करते हैं...और हमारा किसी भी बात पर या किसी भी विषय पर बलात्कार करने से पीछे नहीं हटते...
जैसे पहली बार जब हमारे सीनियर हमारी लेने की कोशिश करते हैं तब हमें अपनी बेइज्जती महसूस होती है वहीं वैश्या को भी अपनी पहली रात में कुछ ऐसा ही अनुभव होता है...
पर कुछ समय निकालने के बाद या मन से काम करते रहने के बाद थोड़ी सीनियारिटी आ ही जाती है...
वैसे ही उस नई वैश्या की भी यही हालत होती है जैसे जैसे वह बाज़ार में हाथों हाथ बिकने लगती है वैसे वैसे उसमें परिपक्वता आती जाती है...बिल्कुल वैसी ही स्थिती हमारी भी होती है...
या यूं कहें कि जैसे जैसे हमारे कपड़े न्यूज़रुम में सरेआम उतारे जाते हैं वैसे वैसे हमारा कॉन्फिडेंस लेवल और भी बढ़ता जाता है...
वैसे एक बात मैं आपको बताता चलूं कि अभी हमें निर्वस्त्र नहीं किया गया है क्योंकि सीनियरों के अनुसार हमें निर्वस्त्र होने में 10-12 साल और लगेंगे...मतलब हमारा पूरा मज़ा लिया जाएगा बिना पैसे के...
ईश्वर से कामना करता हूं की जल्द से जल्द हम भी प्रोफेशनल प्रॉस्टिट्यूट बन जाए...
नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़...
प्रथम प्रयास
मित्रों
आप सभी हमारी इस चौथी दुनिया से परिचित हैं...इस क्षेत्र में अपने परिवार के लिए भी समय निकाल पाना बेहद कठिन है...मैं कई ऐसे रिपोर्टरों को जानता हूं जो व्यस्तता के कारण घर परिवार वालों से बहिषकृत हो गए हैं...क्योंकि जब वे घर जाते हैं उनके बच्चे सो चुके होते हैं और जब वे सोकर उठते हैं तब उनके बच्चे स्कूल जा चुके होते हैं...बच्चों की तो संडे की छुट्टी होती है पर उन रिपोर्टरों की नहीं होती...
ऐसे में ब्लॉग बनाना और उस पर लगातार लिखना बेहद टेढ़ी खीर है...मगर फिर भी सर ओखली में डाला है तो सोचना क्या है...अब लिखते रहेंगे चाहे कोई पढ़े या ना पढ़े...
कम से कम अपनी तो भड़ास निकलती रहेगी जिससे कब्ज़ियत दूर होती रहेगी...
नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़...
आप सभी हमारी इस चौथी दुनिया से परिचित हैं...इस क्षेत्र में अपने परिवार के लिए भी समय निकाल पाना बेहद कठिन है...मैं कई ऐसे रिपोर्टरों को जानता हूं जो व्यस्तता के कारण घर परिवार वालों से बहिषकृत हो गए हैं...क्योंकि जब वे घर जाते हैं उनके बच्चे सो चुके होते हैं और जब वे सोकर उठते हैं तब उनके बच्चे स्कूल जा चुके होते हैं...बच्चों की तो संडे की छुट्टी होती है पर उन रिपोर्टरों की नहीं होती...
ऐसे में ब्लॉग बनाना और उस पर लगातार लिखना बेहद टेढ़ी खीर है...मगर फिर भी सर ओखली में डाला है तो सोचना क्या है...अब लिखते रहेंगे चाहे कोई पढ़े या ना पढ़े...
कम से कम अपनी तो भड़ास निकलती रहेगी जिससे कब्ज़ियत दूर होती रहेगी...
नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़...
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