Thursday, July 16, 2009

इस अंजुमन में आपको आना है एक बार...

मैनें अपनी इस पहली नौकरी के पूरे 1 वर्ष के इस कार्यकाल में कुछ अनुभव किए हैं...जो शायद आप सभी लोगों ने भी अपनी पहली नौकरी में ज़रूर किये होंगे...

आप लोग मेरी इस बात पर कतई दो राय नहीं रखते होंगे कि हमारी पहली नौकरी में हमारी उस नई वैश्या के समान स्थिती होती है जो बाज़ार में पहली बार अपना शरीर बेचने के लिए जाती है...(उनका बाज़ार हमारा चैनल)...
क्योंकि जब हम फ्रेशर के तौर पर आते हैं तब हमारे सभी सीनियर इस क्षेत्र में परिपक्व हो चुके होते हैं...और जो उनके साथ पूर्व में हुआ हो वही हमारे साथ भी करने की भरसक कोशिश करते हैं...और हमारा किसी भी बात पर या किसी भी विषय पर बलात्कार करने से पीछे नहीं हटते...

जैसे पहली बार जब हमारे सीनियर हमारी लेने की कोशिश करते हैं तब हमें अपनी बेइज्जती महसूस होती है वहीं वैश्या को भी अपनी पहली रात में कुछ ऐसा ही अनुभव होता है...

पर कुछ समय निकालने के बाद या मन से काम करते रहने के बाद थोड़ी सीनियारिटी आ ही जाती है...

वैसे ही उस नई वैश्या की भी यही हालत होती है जैसे जैसे वह बाज़ार में हाथों हाथ बिकने लगती है वैसे वैसे उसमें परिपक्वता आती जाती है...बिल्कुल वैसी ही स्थिती हमारी भी होती है...

या यूं कहें कि जैसे जैसे हमारे कपड़े न्यूज़रुम में सरेआम उतारे जाते हैं वैसे वैसे हमारा कॉन्फिडेंस लेवल और भी बढ़ता जाता है...
वैसे एक बात मैं आपको बताता चलूं कि अभी हमें निर्वस्त्र नहीं किया गया है क्योंकि सीनियरों के अनुसार हमें निर्वस्त्र होने में 10-12 साल और लगेंगे...मतलब हमारा पूरा मज़ा लिया जाएगा बिना पैसे के...

ईश्वर से कामना करता हूं की जल्द से जल्द हम भी प्रोफेशनल प्रॉस्टिट्यूट बन जाए...

नवीन सिंह , ज़ी न्यूज़ छत्तीसगढ़...


6 comments:

Samrendra Sharma said...

तुलना करने के लिए ढ़ेरों उदाहरण हो सकते हैं, लेकिन तुमने अपने प्रोफेशन की तुलना ऐसे पेशे से की है जिसे हमारा समाज बुरे नज़र से देखता है। हालांकि मुझे किसी पेशे में बुराई नज़र नहीं आती। हो सकता है कि तुम इसके बारे में मुझेसे बेहतर जानते होगे। लेकिन तुम्हारी सोच से मैं इत्तेफाक इसलिए भी नहीं रख सकता क्योकिं ऐसा जरूरी नहीं है ये केवल यहीं हो रहा है। अगर इंजीनियर या मैंनेजमेंट का कोर्स करके कहीं नौकरी करते तो वहां की परिस्थितियों की तुलना भी वेश्या से हो सकती थी।
खैर मेरा मानना है कि पाजिटिव सोच के साथ आगे बढ़ो और सीनियर्स की डांट फटकार से सबक लेकर अपने भीतर की कमियों को दूर करने की कोशिश करना ही बेहतरी की दिशा का पहला कदम है।

Anonymous said...

मित्र नवीन आप गणित नहीं पढ़ पाए पर साहित्य
पर और लेखनी पर पकड़ है , मिडिया पर अचुक निशाने के लिए शुक्रिया
मनहर

Anonymous said...

मित्र नवीन आप गणित नहीं पढ़ पाए पर साहित्य
पर और लेखनी पर पकड़ है , मिडिया पर अचुक निशाने के लिए शुक्रिया
मनहर

Barun Sakhajee Shrivastav said...

अपने प्रोफेशन को कभी वैश्या कहना ठीक नहीं यूं कहिए कि जब आप स्कूल में हते हैं तो आपको सभी विषय समानांतर रूप से पढ़ते हैं और दबाव भी रहता है लेकिन जैसे ही 11वी कक्षा में आते हैं कुछ हल्के होते जाते हैं ये परिपक्वता की प्रक्रिया है अपने प्रोफेशन को जितना उपयोगी बताएंगे उतना आपकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी वरना तो सभी रोज़ग़ार ढेरों शोषणों और मनमानियों का भरा पूरा बास्केट होता है...प्रिय बाउम्मीद आपका सखाजी

naveen singh said...

आदरणीय समरेंद्र सर और सखा जी तुलना करने के लिए मेरे पास बिल्कुल और उदाहरण थे पर मैंने इसको केवल इसलिए चुना क्योंकि ये हमारे पेशे से थोड़ा बहुत मेल खाता था...मुझे लगता है कि हमारा पेशा विकल्पहीन है या ये भी कह सकते हैं ये समझदारी का दलदल है जो इसमें धसता गया वो फसता गया...ज्यादा समय बिता देने के बाद हमारे पास कोई और विकल्प नहीं बचता और क्योंकि टीवी पत्रकारिता की दुनिया बहुत छोटी सी है इसलिए हमारे सामने भविष्य में कई दिक्कतें भी खड़ी हो जाती हैं...
मगर मैं इमानदारी से आपके हर सुझाव या डांट-फटकार को बिल्कुल सकारात्मक अंदाज़ में ही लेता हूं...और भविष्य में भी लेता रहूंगा...

आपका
नवीन सिंह

sandep said...

अच्छा बेबाकी का लेख , तुम एक दिन मशहूर वेश्या बनोगे यानि एक सफल पत्रकार , उनके जेसे नहीं जो समाज की बुराई से तो वाकिफ है लेकिन मानने को तैयार नहीं. उससे तुला होने पर भी अपने आप को लज्जित मासुस करते है. भले ही उस बुरकी के पेरो में सर रखा हो . शाबाश खोते रहो इसी तरह अपने जेहन की गिरहो को ......... अपनी लेखनी से